शिक्षा विभाग द्वारा शुरू की गई ‘एम-स्टार’ (m-Star) ऐप अब शिक्षकों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बनती जा रही है। गवर्नमेंट टीचर्स यूनियन पंजाब (GTU) ने इस व्यवस्था पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ऑनलाइन हाजिरी के चक्कर में शिक्षकों का सबसे महत्वपूर्ण काम—बच्चों को पढ़ाना—प्रभावित हो रहा है।
ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों के कई शिक्षकों ने भी अपनी समस्याएं साझा करते हुए बताया कि जहां पहले वे पूरा समय कक्षा में बच्चों को देते थे, अब उसका एक बड़ा हिस्सा मोबाइल ऐप से जुड़ी प्रक्रियाओं में ही खर्च हो जाता है। इससे न सिर्फ पढ़ाई का समय कम हो रहा है, बल्कि बच्चों की सीखने की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है।
विरोध क्यों हो रहा है? 🤔
तकनीकी दिक्कतें: सरकारी स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। कई जगहों पर नेटवर्क इतना कमजोर है कि ‘एम-स्टार’ ऐप पर हाजिरी दर्ज करना काफी मुश्किल हो जाता है। कई बार ऐप खुलने में ही लंबा समय लग जाता है या डेटा सेव नहीं होता।
समय की बर्बादी: शिक्षकों का कहना है कि हाजिरी दर्ज करने की प्रक्रिया अपेक्षा से ज्यादा लंबी और जटिल है। इस वजह से रोजाना कई मिनट—कभी-कभी आधा घंटा तक—इसी काम में चला जाता है, जो सीधे तौर पर बच्चों के पढ़ाई के समय को कम करता है।
अनावश्यक दबाव और तनाव: लगातार ऐप के जरिए रिपोर्टिंग और निगरानी से शिक्षकों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है। उनका कहना है कि वे पहले से ही अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, ऐसे में अतिरिक्त डिजिटल प्रक्रियाएं बोझ बढ़ाने का काम कर रही हैं।
जमीनी हकीकत बनाम डिजिटल योजना: नीति स्तर पर डिजिटल निगरानी पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लाई गई थी, लेकिन जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी और तकनीकी खामियों के कारण इसका उद्देश्य पूरा होता नजर नहीं आ रहा।
सरकार को सीधी चेतावनी 📢
यूनियन नेताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर शिक्षा का स्तर सुधारना है, तो शिक्षकों को तकनीकी उलझनों से निकालकर उन्हें कक्षा में अधिक समय देने का अवसर देना होगा। उन्होंने मांग की है:
“विभाग ‘एम-स्टार’ ऐप की अनिवार्यता को तुरंत वापस ले या इसे सरल और व्यावहारिक बनाया जाए, ताकि स्कूलों का माहौल पढ़ाई के अनुकूल रह सके।”
साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि यदि डिजिटल सिस्टम लागू करना ही है, तो पहले स्कूलों में मजबूत इंटरनेट सुविधा और उचित प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए।
बड़ा सवाल ❓
क्या इस तरह की डिजिटल ऐप्स वास्तव में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगी, या फिर यह केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएंगी?
क्या तकनीक का इस्तेमाल सहायक बन रहा है या बाधा?
आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? अपनी राय जरूर साझा करें।

